expenditure in the modern time आधुनिक काल में सार्वजनिक व्यय

expenditure in the modern time आधुनिक काल में सार्वजनिक व्यय

 

expenditure in the modern time

expenditure in the modern timeआधुनिक काल में सार्वजनिक व्यय में वृद्धि के कारणों का वर्णन कीजिए। [Explain the causes of increase in public expenditure in the modern time.

अथवा

भारत में सार्वजनिक व्यय में आशातीत वृद्धि के क्या कारण है? बताइए।

(What are the causes of rapid increase the public expenditure of India.) सार्वजनिक व्यय में वृद्धि के कारण

उत्तर-

(सार्वजनिक व्यय में वृद्धि के कारण)

19वीं शताब्दी तक राजस्व के क्षेत्र में सार्वजनिक व्यय पर सार्वजनिक आय की तुलना में कम ध्यान दिया जाता था। सार्वजनिक व्यय की इस अपेक्षा का प्रधान कारण यह था कि इस समय इसकी व्यय राशि बहुत कम होती वी। क्योंकि राज्य के कार्यों का क्षेत्र सीमित होता था। परन्तु वर्तमान शताब्दी में राज्य के कार्यों में आशातीत वृद्धि हुई है। इस कारण बहुत बड़ी मात्रा में व्यय करने की आवश्यकता पड़ती है। इसलिए कहा जाता है कि सार्वजनिक व्यय का राज्य के कार्यों से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। जैसे-जैसे राज्य द्वारा किये गये अथवा किए जाने वाले कार्यों में वृद्धि होती जाती है वैसे-वैसे सार्वजनिक व्यय की राशि में बढ़ोत्तरी होती जाती है। विगत वर्षों से राज्य के कार्यों में विस्तृत एवं गहन दोनों दृष्टिकोण से वृद्धि द्ध हुई है। यही कारण है कि अब पहले से अधिक राशि व्यय की जाने लगी है। वर्तमान काल में सार्वजनिक व्यय में वृद्धि के निम्नलिखित कारण बताये जाते हैं-

(1) राज्य की सीमाओं तथा जनसंख्या में वृद्धि सार्वजनिक व्यय में वृद्धि का सर्वप्रथम कारण राज्य सीमाओं तया जनसंख्या में वृद्धि है। देश के सभी राज्यों में जनसंख्या तीव्र गति से बढ़ रही है। इसके फलस्वरूप जो क्षेत्र पहले से बसे हुए नहीं वे अब बसाये जा रहे हैं। इसमें राज्य की सीमाओं में व्यापक प्रसार हो रहा है। राज्य को जितने अधिक व्यक्तियों की सेवायें प्रदान करनी पड़ेंगी तया जितने विस्तृत क्षेत्र का प्रबन्ध करना होगा, सार्वजनिक व्यय में उतनी ही अधिक वृद्धि होगी। इससे प्रशासनिक व्यय में भी वृद्धि हुई है। इस कारण सार्वजनिक व्यय में वृद्धि हुई है।

(2) राष्ट्रीय सुरक्षा-आजकल विश्व के लगभग सभी देशों के द्वारा अधिक-से-अधिक सैनिक शक्तियाँ बढ़ाने की तत्परता पायी जा रही है। राष्ट्रों में कटुता तथा अविश्वास के कारण सभी देशों को युद्ध के लिए तैयार रहना पड़ता है। सथ ही विज्ञान के प्रभाव से युद्ध का स्वरूप अत्यन्त विध्वंसकारी हो गया है। आधुनिक नवीनतम अस्त्र-शस्त्रों की लागत इतनी अधिक हो गई है कि उनका उपयोग करना सरल कार्य नहीं रह गया है। ऐसी दशा में सरकार के सुरक्षा व्यय में वृद्धि हो जाना स्वाभाविक है। भारत में गए। वर्षों में सुरक्षा व्यय में पर्याप्त मात्रा में वृद्धि हुई है जिससे सार्वजनिक व्यय भी बढ़ गया है।

(3) आर्थिक नियोजन-आधुनिक काल में प्रत्येक अविकसित तथा अर्द्धविकसित देशों में निर्धनता को दूर करने के लिए नियोजन का आश्रय लिया गया है। देश के विकास के लिए विभिन्न प्रकार की योजनाएँ चलाई जा रही हैं जिन पर पर्याप्त मात्रा में धन व्यय करने की आवश्यकता होती है। आर्थिक नियोजन को युग का रामबाण कहा जाता है। यही कारण है कि भारत में अर्थव्यवस्था में सुधार लाने के लिए आर्थिक नियोजन को 1951 में अपनाया गया। इस कारण भी हमारे देश के सार्वजनिक व्यय में वृद्धि हुई है।

(4) मूल्य स्तर में वृद्धि सार्वजनिक व्यय में वृद्धि का एक अन्य कारण उच्च मूल्य स्तर है। द्वितीय महायुद्ध आरम्भ होने के साथ विश्व के विभित्र देशों में मुद्रा प्रसार आरम्भ हुआ। गत वर्षों में सभी प्रकार की वस्तुओं तथा सेवाओं के मूल्यों में पर्याप्त वृद्धि हुई है। इस प्रकार राज्य को पहले से अधिक व्यय करना पड़ता है। यदि वह पहले के बराबर ही वस्तुओं को खरीदना चाहती है, साथ ही मूल्य वृद्धि के कारण कर्मचारियों के महँगाई भत्ते में वृद्धि से भी सार्वजनिक व्यय में वृद्धि हुई है।

(5) राष्ट्रीय आय तथा जीवन स्तर में वृद्धि-विगत दो शताब्दियों में लगभग सभी देशों में राष्ट्रीय आय तथा उत्पादन में वृद्धि हुई है। प्रत्येक देश में कृषि व्यापार तथा उद्योगों में निरन्तर विकास हुआ है। इससे प्रति व्यक्ति आय में भी वृद्धि हुई है तथा लोगों का जीवन स्तर ऊँचा हो गया है।

(6) कल्याणकारी राज्य की स्थापना-प्राचीनकाल में राज्य का कार्य केवल सुरक्षा तक ही सीमित था। प्रो. एडम स्मिथ ने भी सरकारी हस्तक्षेप क्षेत्र को आन्तरिक एवं बाह्य आक्रमण से सुरक्षा तक ही सीमित बताया था। परन्तु वर्तमान काल में प्रत्येक देश की सरकार एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना चाहती है। प्रत्येक देश की सरकार को सामाजिक कल्याण की प्राप्ति के लिए विभिन्न योजनायें चलानी पड़ती हैं। इन कार्यों पर आजकल भारी मात्रा में व्यय किया जाता है। इससे भी सार्वजनिक व्यय में वृद्धि हुई है।

(7) उद्योगों का राष्ट्रीयकरण-आधुनिक युग में समाजवादी अर्थव्यवस्था की नीति से प्रभावित होकर राज्य अधिक से अधिक उद्योगों को अपने हाथ में लेते जा रहे हैं। उद्योगों के राष्ट्रीयकरण के कारण सरकार एक बहुत बड़ी राशि मुआवजा के रूप में पटाती आ रही है। साथ ही साथ आधुनिक सरकारें स्वयं भी बड़े पैमाने पर उद्योग-धन्धों की स्वापना कर रही है। इस कारण भी सार्वजनिक व्यय में वृद्धि हुई है। आरत में भी विभित्र इकाइयों का राष्ट्रीयकरण किया गया है। इससे भी भारत के व्यय में लोकवृद्धि हुई है।

(8) व्यापार चक्र विरोधी नीति-पूँजीपति अर्थव्यवस्था में तेजी गन्दी के करण उच्चावच आते रहते हैं। इनका देश की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। आज राज्य का यह एक महत्वपूर्ण कर्तव्य है कि वह अर्थव्यवस्था में स्थायित्व व पूर्ण रोजगार की स्थिति बनाये रखो। मब्दीकाल में कभी-कभी सरकार को उद्देश्य की पूर्ति के लिए बड़ी राशि व्यय करनी पड़ती है। अतएव अस्थिरता दूर करने के लिए सरकार को लोक कार्यों पर अधिक व्यय करना पड़ता है। इस कारण भी देश के सार्वजनिक व्यव में वृद्धि होना स्वाभाविक होता है।

(9) नागरिक प्रशासन में वृद्धि-अधिकांश देशों में प्रजातन्त्रात्मक शासन प्रणाली के अपनये जाने के कारण भी सार्वजनिक व्यय में वृद्धि हुई है। संसद, विधानसभाओं, स्थानीय सरकारों के चुनाव आदि की व्यवस्था तथा विभित्र देशों में राजनैतिक सम्बन्ध स्थापित करने के लिए राज्य दूतावासों की व्यवस्था के कारण आधुनिक काल में व्यय में वृद्धि हुई है।

(10) राजनैतिक चेतना का विस्तार आधुनिक काल में शिक्षा व सभ्यता के विकास के साथ-साथ मनुष्य में सामाजिक एवं राजनीतिक चेतना का विकास हुआ है। इस नागरिक चेतना ने वयस्क मताधिकार, स्त्री मताधिकार, श्रमिक संघों की स्थापना तथा श्रमिक कल्याण आदि का भी विकास किया है। इनसे लोग अधिक सुविधाओं की माँग करने लगे तथा इसकी पूर्ति के फलस्वरूप सार्वजनिक व्यय में वृद्धि होना स्वाभाविक है। यही कारण है कि आज ऐसे कार्यों पर एक भारी राशि प्रत्येक देश में व्यय की जाती है।

(11) प्रजातन्त्र का भार आज विश्व के अधिकांश देशों में प्रजातन्त्रात्मक सख्कारें पायी जाती है। जनता द्वारा चुनाव कराये जाने पर एक बहुत बड़ी राशि व्यय की जाती है। साथ ही साथ प्रजातन्त्र में अनेक राजनैतिक दल पाये जाते हैं तथा प्रत्येक दल जनता का सक्रिय समर्थन प्राप्त करना चाहता है। यह जनता में अधिक सुविधा देने की बातें करते रहते हैं। इसके कारण देश के हर भाग में अधिकाधिक सुविधाओं की माँग की जाने लगती है। इसके फलस्वरूप सार्वजनिक व्यय में वृद्धि हो जाती है।

(12) कृषि तथा उद्योगों को आर्थिक सहायता वर्तमान समय में देश के उत्पादन में वृद्धि करना राज्य का कर्तव्य मामा जता है। इसके लिए देश के उद्योगों तथा कृषि को विभिन्न प्रकार की सुविधाएँ प्रदान की जाती है। उत्पादन में वृद्धि करने के लिए उद्योगों व कृषि को ऋण, अनुदान तथा आर्थिक सहायता दी जाती है। उन्हें समय-समय पर तकनीकी एवं अन्य प्रकार की सलाहें भी दी जाती है। एक विकासशील अर्थव्यवस्था में इस कारण भी सार्वजनिक व्यय में पर्याप्तता से वृद्धि हुई है।

(13) आवश्यकताओं की सामूहिक सन्तुष्टि-आधुनिक काल में राज्य के कार्यों में इस कारण भी वृद्धि हुई है कि राज्य अधिक से अधिक कल्याणकारी कार्यों को करने लगा है। अन्य शब्दों में आज राज्य उन सभी कार्यों को करने लगा है जो पहले व्यक्तिगत व्यक्ति या कम्पनियों किया करती थीं। उदाहरणार्थ-परिवहन, जल, प्रकाश आदि की व्यवस्था सामूहिक रूप से राज्य द्वारा ये सुविधायें जनता को प्रदान की जाती हैं। वर्तमान समय में सभी देशों में सार्वजनिक व्यय में वृद्धि का यही कारण पाया जाता है। भारत में सार्वजनिक वृद्धि का यही कारण है।

(14) सार्वजनिक क्षेत्र का विकास आज अधिकांश देशों में तीव्र गति से 'विकास करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र का भी विकास किया गया है। इससे विकास को बढ़ावा मिलता है। सार्वजनिक क्षेत्र में नई-नई इकाइयों का निर्माण किया जाता है। उदाहरणार्थ, भारत में भिलाई, राजरकेला व दुर्गापुर आदि क्षेत्रों में लोहे-इस्पात के कारखानों की स्थापना से द्वितीय पंचवर्षीय योजना में सार्वजनिक व्यय में वृद्धि हुई है।

(15) सामाजिक सुरक्षा में वृद्धि-आज राज्य का उद्देश्य कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है। इसका आधार अधिकतम लोगों का अधिकतम कल्याण करना होता है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए समाज के श्रमिक वर्ग को विभिन्न प्रकार के जोखिमों के विरुद्ध व्यापक रूप से सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था की जाती है। इसके अन्तर्गत सामाजिक बीमा, वृद्धावस्था पेंशन, मातृत्व लाभ आदि की सुविधायें प्रदान की जाती है।

(16) युद्ध तया युद्ध निवारण सम्बन्धी व्यय-वर्तमान काल में युद्ध करने की कला अत्यन्त खर्चीली हो गई है। दो महायुद्धों ने विश्व को यह पाठ पड़ा दिया है कि यदि अब युद्ध किया गया तो सम्पूर्ण विश्व विनाश की स्थिति में पहुँच सकता है। यही नहीं युद्ध को रोकने के आपस में समझौते जिन्ये जाते हैं, इस कारण भी सार्वजनिक व्यय में पर्याप्त वृद्धि हुई है। ऐसा इसलिए किया जाता है, ताकि विश्व में शान्ति स्थापित की जा सके। (17) पूर्ण रोजगार का लक्ष्य-स्वर्गीय लाई कीन्स के अनुसार पूर्ण रोजगार के स्तर के पूर्व ही बचत एवं विनियोग में साम्य हो जाने के कारण से अर्थव्यवस्था स्थिर हो जाती है। इसलिए सरकार को पूर्ण रोजगार की स्थिति प्राप्त करने के लिए सार्वजनिक निर्माण कार्यों की योजना बनाकर व्यय करना पड़ता है। इस व्यवस्था के कारण सार्वजनिक व्यय में पर्याप्त मात्रा में वृद्धि होना स्वाभाविक होता है। 

(18) स्थानीय व सामाजिक समस्याएँ-कभी-कभी देश के समक्ष स्थानीय एवं सामाजिक समस्याएँ भी पर्याप्त मात्रा में उपस्थित हो जाती हैं। इनके तात्कालिक समाधान की आवश्यकता पड़ती है। इन समस्याओं के समाधान के लिए पर्याप्त धन की आवश्यकता पड़ती है। कभी-कभी शरणार्थियों के आगमन के कारण भी पर्याप्त धन व्यय करना पड़ता है।

(19) अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों का प्रभाव आजकल विश्व के आधार पर संघ की स्थापना की जा रही है। ऐसी योजना के फलस्वरूप अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेक मौद्रिक तथा अमौद्रिक संस्थाओं की त्यापना की गई है। इनका आधार भी विनियोग होता है। इनमें किसी न किसी रूप में देशों को सार्वजनिक व्यय के रूप में आय से दिया जाता है, यह भी सार्वजनिक व्यय में वृद्धि का एक कारण है।

उपर्युक्त कारणों से स्पष्ट होता है कि आधुनिक काल में सार्वजनिक व्यय में वृद्धि का प्रधान कारण राज्य के कार्यों में वृद्धि है। प्रो वैगनर के शब्दों में, "राज्य के कार्यों में गहन एवं विस्तृत दोनों रूपों में वृद्धि हुई है।

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